सोच
कभी सोचता हूं क्या लिखा जाए क्या कहा जाए क्या वहीं पुरानी किताबों बातें या फिर नए तराने बुने जाए या फिर लड़ा जाए उन्ही रीतियों के साथ जिस तरह से पिता के साथ कुछ नया करे या वहीं पुरानी किताबों के पन्नों से ढूंढ़ कर वहीं पढ़ते चले जाएं रीतियां वहीं है बस नजरिया बदलने कि देर है